
धराली की वेदना
नारी हो या प्रकृति अपना रौद्र रूप तभी दिखाती है
जब हिंसा सिर चढ़ आती हैं
जब तक सह सकती सहती है
फिर विनाशकारी होकर विनाश पर उतर आती है
कुल्हाड़ी की मार से बहुत जख्म खाए हैं
बेज़ुबान घने जंगल काट बंजर कर गिराए हैं
बेदर्दी से काटा नोचा खसोटा वनस्पति को
तब तबाही त्रासदी रूप ले पृथ्वी पर उतर आई है
दुर्बल क्षीण होती चट्टानों ने किया नहीं उफ़्फ़ कभी
इंसानियत ने जब लांघी हदें प्रकृति ने सीमाएं तोड़ी तभी
नारी हो या प्रकृति अपना रौद्र रूप तभी दिखाती है
जब हिंसा सिर चढ़ जाती हैं
सहती जब तक सह सकती है
फिर विनाशकारी बन विनाश पर उतर आती है
ये बेज़ुबान प्रकृति मौन खड़ी रोती रही
इमारत पर इमारत पहाड़ खोद चढ़ती रही
और प्रगति की चाह में इन्सान की इंसानियत घटती रही
शब्दों में जान होती है खामोशी विध्वंसकारी है
हमेशा से स्वार्थी बुद्धिजीवियों पर भारी है
ऐसे में नादान भोले-भाले मासूम बली चढ़ जाते हैं
जब भी बेरहम इन्सान के कुकर्म बढ़ जाते हैं
धराली गाँव के शिव-शक्ति ने भी देकर आहुति अपनी खिची नष्ट की रेखा है
जब भी प्रकृति को नैराश्य होते देखा है
हज़ारों वर्ष पुरानी शिव प्रतिमाएँ सेकेंड में धाराशायी धरती में समा गईं
कठोर प्रलय तले मानव जाति की बर्बरता क्षण भर में दफ़ना गई
यह भयावन दृश्य पहाड़ों में एक चेतावनी लेकर आया है
स्वीकार करो मान जाओ !
मत छेड़ो इन खूबसूरत शांत पेड़ पौधों और फूलों की फुलवारी को
जो मानव जीवन में निस्वार्थ प्राण भरते हैं
– अनिता चंद











