
साक्षात्कार”
मैं खुद में खुद को खोजती हूँ
कई बार टकराती हूँ विचारों से
फिर खुद को झँझोड़ती हूँ
मैं ख़ुद में ख़ुद को खोजती हूँ
जब कभी मिल लेती हूँ ख़ुद से
ख़ुश होकर खुद को भूल जाती हूँ
दूरियों को नज़दीक से देख पाती हूँ
कभी अपनों में पराई कभी परायों में
खुद को अपना सा पाती हूँ
बह जाती हूँ बहती हुई नदिया सी
चलती हूँ साथ खुद के चलती हुई दुनिया सी
खुद को समझाती कभी समझती हूँ
अक्सर मैं ख़ुद में ख़ुद को खोजती हूँ
-अनिता चंद
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