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अतीत

अतीत

बन्द कमरे में एकत्रित
धूल से लिपटे असबाब सा है
अतीत की यादों का मंज़र,

खुल जाए किबाड़ अगर
हवा के झोंके से टकरा कर
तोड़ देगा सब पहरे

कभी मधुर तो कभी कड़वा
अनुभव का प्रवाह बनकर,

अतीत के हाथों कमज़ोर जो बना
रख लेगा गिरवी भुलाकर
मर्यादा सभी
कभी बदले की आग तो
कभी प्यार की धार बनकर

ना होने दो हावी इसको ख़ुद पर
वरना लिखा जायेगा
जीवन का इतिहास हाथों इसके

जो न समझा कर्म को कल
वो आज गहराइयों को
क्या खाक समझ पायेगा

बन्द कमरे की गर्द को न दो हवा
बना लो महलों में नए झरोखे रोशनी के लिए

चिनवाओ न दीवारे होने दो रूबरू दिलों को
आर-पार आईने जैसा

संभाल गये गर आज तभी
जीवन की गहराइयों को समझ पाओगे
छोड़ दो कल क्या था न खोलो
अतीत के बन्द दरवाज़ों को

अंजुमन अपना सज़ाओ
रहकर काँटों में नाज़ुक फूलों जैसा
तभी उन्नति का मार्ग खोज पाओगे ।।

वर्तमान ही सत्य है !
सत्य ही उन्नति की मार्ग-दर्शक है

-अनिता चंद 2018

Published inअभिव्यक्ति

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