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“गान्धारी की वेदना”

“गान्धारी की वेदना”

करुणा रस में रचि कविता

हे देवकी नन्दन तुम माँ की पीड़ा न समझ पाओगे

इस माँ ने कौरवों को मृत्यु के घाट उतरते देखा है

पूछो, देवकी से जाकर जिसके पास सन्तान मृत्यु का लेखा है

युद्ध में सौ पुत्रों को खोने का गान्धारी दुःख नहीं सह पाई

घायल हृदय से कृष्ण पर हत्या का आरोप लगाई

आँसू भी थामे नहीं थमते हैं

गांधारी पुछ बैठी मधुसूदन से,

क्यूँ तुमको इस माँ पर जरा भी दया नहीं आई

हे देवकी नन्दन! तुम तो ज्ञानी थे अंतरयामी थे

तुम इस युद्ध विनाश को टाल सकते थे

कुल को मृत्यु शय्या पर जाने से रोक सकते थे

फिर क्यूँ नहीं तुम युद्ध रोक पाए

सब ख़त्म होने पर

आज सामने खड़े होने मेरे ,तुम किस लिए हो आए

मृत्यु शैय्या पर विलाप करती माताओं और स्त्रियों को देखो,

बहन-बेटियों और सौ कौरवों की पत्नियों को शव शय्या पर

रोते बिलखते देखो

कृष्ण! तुम और तुम्हारा वंश मेरे श्राप से नहीं बच पाएगा

जैसे तुमने कौरव वंश का सर्वनाश किया

वैसे ही तुम्हारे यदुवंश का एक दिन नाश हो जाएगा

हाथ में श्राप लिए विलाप करती गांधारी पुत्र मृत्यु पीड़ा में

कृष्ण को श्राप देने से न रोक पाई

निशब्द श्री कृष्ण हाथ जोड़े सिर झुकाए हर वचन स्वीकारते रहे

माँ गान्धारी की पीड़ा को महसूस कर हार मानते रहे

-अनिता चंद (copyright)

Published inअभिव्यक्ति

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