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यात्रा का लुत्फ़ (Included in CBSE curriculum) -Anita Chand

यात्रा का लुत्फ़

कितना सुन्दर दृश्य था-

बड़े मज़े उड़ा  रहे थे लोग,

बोल  रहा था एक,

तो बाक़ी, ठहाके लगा रहे थे लोग!

मैं अकेला, सोचने लगा, 

क्या मज़ेदार  है ज़िन्दगी इनकी!

एक वो हैं जो सीट कन्फ़र्म नहीं,

तो मुँह लटका लेते हैं|

और जरा देखो इन्हें!

सीट है तो भला,

नहीं  तो बिना सीट  भी 

यात्रा का लुत्फ़ उठा लेते हैं लोग

नज़ारे का लुत्फ़, देसी भीड़ हो जहाँ, वहीं मिलता है दोस्त !

भारतीय रेल से यात्रा भी कुछ कम रोचक नहीं  होती,

सुनने वाला मिल जाए गर, सुनाने वालों की भी कमी नहीं  होती!

यात्रा कुछ ऐसी थी-

ज्ञान के बखान में कोई पीछे नहीं था

राजनीति तूल पर थी,

टीवी कनेक्शन बिना ही ‘लाईव’ प्रसारण सा

प्रवचन सुना रहे थे लोग|

देखते ही देखते  हर एक योजना का खुलकर बखान होने लगा,

किसी की बढ़-चढ़कर तारीफ़ों के पुल बंधे

तो किसी का ग्राफ़ नीचे गिराने में लगे थे लोग|

रेलगाड़ी भी थी रफ़्तार पर,

राजनीति भी थी अपने पूरे परवान पर,

तभी एक सज्जन अपनी पर आए और सबसे उलझ पड़े!!

लगता था जैसे कच्चे कानों के हों वो;

आने वाले वर्षों में क्या होगा,

उसका दावा वे खुलेआम करने लगे वो

कुछ तो सुनकर उनका बयान, भड़क गए;

तो कुछ विदुषी बने और हौले  से बोले; 

और कुछ तो चुपचाप सुनते ही रहे|

रेल भी अपनी मौजूदगी दिखाने लगी,

ज़ोर-ज़ोर से सीटी बजाने लगी| 

लगता था वो भी हिस्सा बनगई हो इस तर्क-वितर्क का,

सीटी मार, ऊऊऊ छुकपक छुकपक ऊऊऊऊ की तान लगाने लगी|

अब रेल की चाल हुई कुछ धीमी,

धीरे-धीरे वह स्टेशन के क़रीब पहुँचने लगी|

हलचल सी हुई,

राजनीति पर विराम लगने लगा|

संतरों की महक से

मुँह में पानी आने लगा|

आभास हुआ नागपुर आ गया!

नागपुर आ गया!

 हाँ! ये तो नागपुर आ गया भाई|

ट्रेन रुकी|

आवागमन शुरू हुआ,

क़ुली भी मदद के लिए तैनात दिखने लगे

देखते ही देखते कुछ उतर गये,

तो कुछ नये मुसाफ़िर चढ़ने लगे

थोड़ी हलचल सी हुई और  पुनः रेलगाड़ी चल पड़ी,

छुकपक छुकपुक ऊऊऊऊ!!

ये तो एक पड़ाव था|

नये मुसाफ़िर अपने स्थान ग्रहण कर 

विराजमान होते दिखाई देने लगे, 

सबने राहत की साँस ली!

सिलसिला बातों का फिर से शुरू हो चला,

बातों का रूख अब कुछ  बदला सा लगा|

चर्चाओं में सरकार और चमत्कार दोनों की बराबरी होने लगी|

राजनीति भूलकर बातों में बाबाओं के चमत्कार सुनाई आने लगे|

भारती बाबा को आदर्शवादी मानने वाले

उनके चमत्कारों के गुण गाने लगे|

खैर,गहरे विषय हैं,

इन बातों का कोई अंत नहीं|

मैं तो यही सोचकर ख़ुश हूँ

ये बनगई मेरी ज़िन्दगी की एक सुखद यादगार यात्रा! 

(साक्षात् भारत के दर्शन करने हों तो रेल की एक यात्रा ज़रूरी है|

एक रोचक अनुभव के साथ, भारतीय तौर-तरीक़े सिखने के लिए, 

भारत में रहकर भारतीय आबो-हवा से क्या परहेज़? ज़िन्दगी इसी का नाम)

-Anita Chand

Published inअभिव्यक्ति

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