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Month: June 2025

अंतर्मन की खोज

साक्षात्कार”
मैं खुद में खुद को खोजती हूँ
कई बार टकराती हूँ विचारों से
फिर खुद को झँझोड़ती हूँ
मैं ख़ुद में ख़ुद को खोजती हूँ

जब कभी मिल लेती हूँ ख़ुद से
ख़ुश होकर खुद को भूल जाती हूँ
दूरियों को नज़दीक से देख पाती हूँ
कभी अपनों में पराई कभी परायों में
खुद को अपना सा पाती हूँ

बह जाती हूँ बहती हुई नदिया सी
चलती हूँ साथ खुद के चलती हुई दुनिया सी
खुद को समझाती कभी समझती हूँ
अक्सर मैं ख़ुद में ख़ुद को खोजती हूँ

-अनिता चंद

यात्रा का लुत्फ़ (Included in CBSE curriculum) -Anita Chand

यात्रा का लुत्फ़

कितना सुन्दर दृश्य था-

बड़े मज़े उड़ा  रहे थे लोग,

बोल  रहा था एक,

तो बाक़ी, ठहाके लगा रहे थे लोग!

मैं अकेला, सोचने लगा, 

क्या मज़ेदार  है ज़िन्दगी इनकी!

एक वो हैं जो सीट कन्फ़र्म नहीं,

तो मुँह लटका लेते हैं|

और जरा देखो इन्हें!

सीट है तो भला,

नहीं  तो बिना सीट  भी 

यात्रा का लुत्फ़ उठा लेते हैं लोग

नज़ारे का लुत्फ़, देसी भीड़ हो जहाँ, वहीं मिलता है दोस्त !

भारतीय रेल से यात्रा भी कुछ कम रोचक नहीं  होती,

सुनने वाला मिल जाए गर, सुनाने वालों की भी कमी नहीं  होती!

यात्रा कुछ ऐसी थी-

ज्ञान के बखान में कोई पीछे नहीं था

राजनीति तूल पर थी,

टीवी कनेक्शन बिना ही ‘लाईव’ प्रसारण सा

प्रवचन सुना रहे थे लोग|

देखते ही देखते  हर एक योजना का खुलकर बखान होने लगा,

किसी की बढ़-चढ़कर तारीफ़ों के पुल बंधे

तो किसी का ग्राफ़ नीचे गिराने में लगे थे लोग|

रेलगाड़ी भी थी रफ़्तार पर,

राजनीति भी थी अपने पूरे परवान पर,

तभी एक सज्जन अपनी पर आए और सबसे उलझ पड़े!!

लगता था जैसे कच्चे कानों के हों वो;

आने वाले वर्षों में क्या होगा,

उसका दावा वे खुलेआम करने लगे वो

कुछ तो सुनकर उनका बयान, भड़क गए;

तो कुछ विदुषी बने और हौले  से बोले; 

और कुछ तो चुपचाप सुनते ही रहे|

रेल भी अपनी मौजूदगी दिखाने लगी,

ज़ोर-ज़ोर से सीटी बजाने लगी| 

लगता था वो भी हिस्सा बनगई हो इस तर्क-वितर्क का,

सीटी मार, ऊऊऊ छुकपक छुकपक ऊऊऊऊ की तान लगाने लगी|

अब रेल की चाल हुई कुछ धीमी,

धीरे-धीरे वह स्टेशन के क़रीब पहुँचने लगी|

हलचल सी हुई,

राजनीति पर विराम लगने लगा|

संतरों की महक से

मुँह में पानी आने लगा|

आभास हुआ नागपुर आ गया!

नागपुर आ गया!

 हाँ! ये तो नागपुर आ गया भाई|

ट्रेन रुकी|

आवागमन शुरू हुआ,

क़ुली भी मदद के लिए तैनात दिखने लगे

देखते ही देखते कुछ उतर गये,

तो कुछ नये मुसाफ़िर चढ़ने लगे

थोड़ी हलचल सी हुई और  पुनः रेलगाड़ी चल पड़ी,

छुकपक छुकपुक ऊऊऊऊ!!

ये तो एक पड़ाव था|

नये मुसाफ़िर अपने स्थान ग्रहण कर 

विराजमान होते दिखाई देने लगे, 

सबने राहत की साँस ली!

सिलसिला बातों का फिर से शुरू हो चला,

बातों का रूख अब कुछ  बदला सा लगा|

चर्चाओं में सरकार और चमत्कार दोनों की बराबरी होने लगी|

राजनीति भूलकर बातों में बाबाओं के चमत्कार सुनाई आने लगे|

भारती बाबा को आदर्शवादी मानने वाले

उनके चमत्कारों के गुण गाने लगे|

खैर,गहरे विषय हैं,

इन बातों का कोई अंत नहीं|

मैं तो यही सोचकर ख़ुश हूँ

ये बनगई मेरी ज़िन्दगी की एक सुखद यादगार यात्रा! 

(साक्षात् भारत के दर्शन करने हों तो रेल की एक यात्रा ज़रूरी है|

एक रोचक अनुभव के साथ, भारतीय तौर-तरीक़े सिखने के लिए, 

भारत में रहकर भारतीय आबो-हवा से क्या परहेज़? ज़िन्दगी इसी का नाम)

-Anita Chand

“गान्धारी की वेदना”

“गान्धारी की वेदना”

करुणा रस में रचि कविता

हे देवकी नन्दन तुम माँ की पीड़ा न समझ पाओगे

इस माँ ने कौरवों को मृत्यु के घाट उतरते देखा है

पूछो, देवकी से जाकर जिसके पास सन्तान मृत्यु का लेखा है

युद्ध में सौ पुत्रों को खोने का गान्धारी दुःख नहीं सह पाई

घायल हृदय से कृष्ण पर हत्या का आरोप लगाई

आँसू भी थामे नहीं थमते हैं

गांधारी पुछ बैठी मधुसूदन से,

क्यूँ तुमको इस माँ पर जरा भी दया नहीं आई

हे देवकी नन्दन! तुम तो ज्ञानी थे अंतरयामी थे

तुम इस युद्ध विनाश को टाल सकते थे

कुल को मृत्यु शय्या पर जाने से रोक सकते थे

फिर क्यूँ नहीं तुम युद्ध रोक पाए

सब ख़त्म होने पर

आज सामने खड़े होने मेरे ,तुम किस लिए हो आए

मृत्यु शैय्या पर विलाप करती माताओं और स्त्रियों को देखो,

बहन-बेटियों और सौ कौरवों की पत्नियों को शव शय्या पर

रोते बिलखते देखो

कृष्ण! तुम और तुम्हारा वंश मेरे श्राप से नहीं बच पाएगा

जैसे तुमने कौरव वंश का सर्वनाश किया

वैसे ही तुम्हारे यदुवंश का एक दिन नाश हो जाएगा

हाथ में श्राप लिए विलाप करती गांधारी पुत्र मृत्यु पीड़ा में

कृष्ण को श्राप देने से न रोक पाई

निशब्द श्री कृष्ण हाथ जोड़े सिर झुकाए हर वचन स्वीकारते रहे

माँ गान्धारी की पीड़ा को महसूस कर हार मानते रहे

-अनिता चंद (copyright)

चिंगारी

चिंगारी

जब आग की धूनी जलती है चिंगारी बिखर निकलती है !!

गुमसुम बैठे हाथ बाँधे रहे अगर कंधा कैसे दे पाओगे

जो लिपटा है कफ़न में श्मशान कैसे पहुँचाओगे

कुछ तो कर्तव्य अपना भी दिखाना होगा

हर एक को मिलकर कंधे से कंधा लगाना होगा

वीरों को आता हैं आगे बढ़कर झुकने से पहले तिरंगा उठाना

काँधे पर चढ़कर नहीं आता जली अग्नि बिन बुझाए भाग जाना

ये सुगबुगाती अग्नि है जो जल्दी नहीं बुझ पाएगी

साझा कदम उठ गए तो अमृत ज़रूर बरसाएगी

जो शहीद हुए उनको माथे से लगाना आना

यही बीता इतिहास है दोहराना

जो बाक़ी है उसे प्रतिज्ञा से लिखेंगे

कदम से कदम मिले तो जीत हासिल कर लेंगे

जय हिन्द !!